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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण कार्यो से बदली एरण के गुप्तकालीन स्मारकों की तस्वीर

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FB IMG 1768479370040 1सागर/वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी 8225072664 * दो-तीन वर्ष पूर्व तक देश के अत्यंत महत्वपूर्ण गुप्तकालीन पुरास्थल एरण के स्मारक उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में लगभग वीरान पड़े थे। बिना नदी के तट पर स्थित इस ऐतिहासिक स्थल का गौरव धूल, काई और क्षरण में दबता जा रहा था। वराह प्रतिमा, विष्णु प्रतिमा और गरुड़ध्वज स्तंभ उपेक्षित अवस्था में थे, जबकि नृसिंह प्रतिमा तीन हिस्सों में टूटी पड़ी थी। सती स्तंभ जंगल में खंडित अवस्था में पड़ा था। इन सभी स्मारकों का उल्लेख सर्वप्रथम अलेक्जेंडर कनिंघम ने वर्ष 1874,75 में किया था।
हालांकि, पिछले दो वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), जबलपुर मंडल द्वारा किए गए संरक्षण एवं संवर्धन कार्यों ने एरण की तस्वीर ही बदल दी है। एरण महोत्सव के दौरान अब देशदृप्रदेश से आए पर्यटक, शोधार्थी और इतिहासप्रेमी इन स्मारकों की भूरिदृभूरि प्रशंसा कर रहे हैं। पुरातात्विक स्थल एरण से लगभग एक किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में पहलाजपुर ग्राम के पास स्थित सती स्तंभ वर्षों से उपेक्षित था। यहाँ तक पहुँचने के लिए कोई समुचित मार्ग न होने से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आमजन को खेतों की पगडंडियों से होकर जाना पड़ता था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पुरातात्विक मानदंडों के अनुरूप सती स्तंभ को उसके मूल स्वरूप में पुनः स्थापित किया, सुरक्षा घेरा विकसित किया तथा स्थानीय प्रशासन के सहयोग से पहुँच मार्ग का निर्माण भी कराया। गुप्तकालीन विशाल नृसिंह प्रतिमा, जिसकी ऊँचाई लगभग 7 फीट है, घुटने के नीचे से खंडित थी। प्रतिमा का ऊपरी हिस्सा अत्यंत भारी होने के कारण इसका पुनः स्थापना कार्य चुनौतीपूर्ण था। पुरातात्विक नियमों एवं आधुनिक तकनीक की सहायता से इसे सावधानीपूर्वक पुनः मूल स्थान पर स्थापित कर एरण की एक महत्वपूर्ण धरोहर को नया जीवन दिया गया। एरण के प्रसिद्ध कृष्ण लीला फलक, जिनमें श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर कंस वध तक की कथाएँ उकेरी गई हैं, पहले अव्यवस्थित और धंसे हुए चबूतरे पर लगे थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पूरे अधिष्ठान का पुनर्संयोजन कर इन्हें क्रमबद्ध ढंग से, उचित ऊँचाई पर सांस्कृतिक सूचना पट्टों के साथ पुनः प्रदर्शित किया, जिससे इनके अवलोकन में अब कोई असुविधा नहीं होती।
पुरतविक स्थल एरण के निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि यहाँ कि विशाल प्रतिमाओं एवं संरचनाओं में कवक (Fungus), शैवाल (Algae), लाइकेन (Lichen), काई (Moss) से प्रतिमाओं एवं संरचनाओं पर काले धब्बे के कारण बदरंग / बदसूरत दिखना, पत्थरों पर पपड़ी के सदृश्य – पीले, नीले, हरे रंग के गोल चकते पड़ना, प्रतिमाओं विरूपण एवं इन दोषों के कारण प्रस्तर होने वाले क्षरण को तीव्र हो गया है | इन सभी दोषों को दूर करने हेतु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रसायन शाखा द्वारा व वैज्ञानिक विधि से यहाँ के प्रतिमाओं एवं संरचनाओं का वैज्ञानिक / रासायनिक उपचार कर उनके संरक्षण / संबर्धन का कार्य किया गया जिससे ये इन प्रतिमओ एवं संरचनाओं को मूल स्वरूप को प्राप्त कर सके तथा विरूपण एवं क्षरण जैसे दुष्प्रभावों को रोक जा सके।

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